
Aravalli Range: पर मंडराता खतरा क्या खत्म होने वाली है भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला?
अरावली पर्वत ढाई अरब साल पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार है!अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा ने चारो तरफ नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर “सेव द अरावली” नाम से एक कैंपेन चलाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के 100 मीटर वाले फैसले को लेकर हर कोई सवाल खड़े कर रहा है। लोगों की चिंता का मुख्य कारण है कि अगर यह नई परिभाषा अरावली पर लागू हो गई और इसके जंगल कटे तो उत्तर भारत का क्या होगा?
इंस्टाग्राम में फेसबुक में , इस समय हर तरफ अरावली की लाइनों और रील्स से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। इसका सिर्फ एक कारण है और वो है अरावली पर्वत । हजारों-लाखों सालों से उत्तर भारत की नेचुलर शील्ड बनकर अरावली की पर्वत श्रंखलाएं खड़ी है ! ये पर्वत श्रंखलाएं कुछ पहाड़ियों बस का समूह नहीं हैं, बल्कि यह वो ढ़ाल हैं जिसके कारण उत्तर भारत आज तक रेगिस्तान नहीं बना है।
ये रेगिस्तान को दिल्ली में आने से रोकता है और गर्म और रेतीली हवाओं को भी यहा आने नही देता ! अब इस अरावली पर्वत को लेकर लोगों में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसके बाद चिंता है। हर कोई बस यही कह रहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा लागू हो गई और अरावली के जंगल को काट दिया गया , तो उत्तर भारत का भविष्य खतरे में आ जायेगा! क्या दिल्ली-NCR और उसके आसपास के इलाके रेगिस्तान जैसे हालात की ओर बढ़ जाएंगे?
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इन सारे सवालों का जवाब जानने से पहले हमें जानना होगा कि अरावली पर्वत का इतिहास क्या है, और उत्तर भारत के लिए यह इतना क्यों जरूरी है। और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है !
अरावली पर्वत का इतिहास :
अरावली पर्वत श्रृंखला 2.5 अरब साल पुरानी बताई गयी है। यह दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है ! अरावली हिमालय से भी पुरानी है। इतिहासकारों का कहना है कि जब दुनिया महाद्वीपों में नहीं बंटी थी तब भी अरावली पर्वत का अस्तित्व था। अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला है, यह पैलियोप्रोटेरोजोइक युग की है।
पर्यावरण विदों और वैज्ञानिकों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला का निर्माण करोड़ों साल पहले टेक्टोनिक प्लेटों के आपस में के कारण हुआ था ,जब भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो पृथ्वी की परत मुड़कर ऊपर उठ गई। जिससे यह दुनिया की सबसे पुरानी वलित (फोल्डेड) पर्वत श्रृंखलाओं में से एक बन गई। वर्तमान में यह अरावली लगभग 670 किमी (420 मील) दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैली है।
अरावली पर्वत कितने राज्य में फैली है :
अरावली पर्वत श्रंखला दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान से होते हुए गुजरात तक फैली है। इस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी राजस्थान के माउंट अबू में स्थित गुरु शिखर है, इसकी उंचाई लगभग 1,722 मीटर (5,650 फीट) है। दिल्ली का राष्ट्रपति भवन जिस रायसीना हिल्स पर बना है, वह भी इसी पर्वत श्रृंखला का एक हिस्सा है।
इस पर्वत का इतिहास बहुत ही स्वर्णिम रहा है। मध्यकालीन भारत में , भारत पर जब मुगल का शासन था उस दौरान यह महाराणा प्रताप जैसे वीरों के लिए शरणस्थली भी बनी थी । अंग्रेजों के समय में इसका बहुत तेजी दोहन हुआ था। उस समय बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हुई थी और खनिज संसाधनों को निकाला गया था ।
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अरावली पर्वत का ऐतिहासिक महत्व
अरावली पर्वत का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना ही पुराना है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता था। राजपूत काल में अरावली की पहाड़ियों पर कई किले और नगर बसे, जो प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते थे। अरावली ने सदियों तक मानव सभ्यता को पानी, उपजाऊ भूमि और सुरक्षा दी है।
अरावली का पर्यावरणीय महत्व क्यों है इतना खास
अरावली पर्वत उत्तर भारत के पर्यावरण के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। यह थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है। साथ ही यह वर्षा जल को रोककर जमीन में समाहित करती है, जिससे भूजल स्तर बना रहता है। अरावली की हरियाली तापमान को नियंत्रित करती है और धूल-मिट्टी व प्रदूषण को फैलने से रोकती है।
अरावली उत्तर भारत के लिए क्यों जरूरी है?

अरावली को उत्तर भारत की ‘नेचुरल शील्ड’ कहा जाता है। इसकी कई वजहें हैं। राजस्थान का थार रेगिस्तान प्राकृतिक रूप से उत्तर-पूर्व दिशा में फैलने की कोशिश करता है, यानी दिल्ली और हरियाणा की ओर। ऐसे में अरावली ही इस रास्ते में ढ़ाल बनकर खड़ी है।
इसके अलावा, अरावली के जंगल राजस्थान की ओर आने वाली गर्म और धूलभरी हवाओं को आने से भी रोकती है। अरावली के जंगल धूल को रोकते हैं। पेड़-पौधे डस्ट फिल्टर का काम करते हैं। अगर यह पर्वत श्रृंखलाएं कमजोर होंगी और यहां व्यापक पैमाने पर जंगलों का खनन होगा तो इन हवाएं के तेजी से उत्तर भारत में आने के लिए दरवाजा खुल जाएगा। जिससे दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण के साथ ही मरुस्थलीकरण की समस्या और विकराल हो जाएगी।
अगर अरावली पर्वत नष्ट हुई तो क्या होगा

अगर अरावली पर्वत पूरी तरह नष्ट हो गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर होंगे। थार रेगिस्तान तेजी से फैल सकता है। दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण और तापमान दोनों बढ़ेंगे। जल संकट गहरा जाएगा और हीटवेव जैसी घटनाएं आम हो जाएंगी। इसका असर सीधे करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ेगा।
अरावली की पर्वत श्रंखलाएं केवल रेतीली गर्म हवाओं बस को नहीं रोकतीं, बल्कि यह भूगर्भ के जल स्तर को भी बढ़ाती हैं। अरावली की पहाडियां बारिश के पानी को रोककर रखती है और जमीन में रिसने देती है, जिससे भूजल रिचार्ज होता रहता है। दिल्ली एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान में पहले से ही पानी को लेकर बड़ा संकट है। इसकी सबसे बड़ी वजह अरावली पर्वत का लगातार कमजोर होना भी मानागया है। ऐसे में अगर यहां व्यापक रूप से अरावली पहाडियों को नष्ट किया गया तो यह संकट और भी गहरा हो जाएगा।